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Wednesday, December 28, 2022

हे नदी माँ



नदी के अनोखे रूप देखकर
पूंछा मैंने कुछ इस कदर

हे नदी माँ
तुम इतनी निराली क्यों हो
जब खूब वर्षा होती है
सैलाब बन डराती हो
अकाल जब पड़ता है
बून्द बून्द को तरसाती हो

नदी बोली
मै कहाँ कुछ करती हूँ
दोनों भी प्रकृति के वरदान है
मै तो बस कर्त्तव्य निभाती हूँ
मेरा अस्तित्व नियति का खेल है
मै खुद से ना बढ़ा सकती हूँ
ना कभी घटा सकती हूँ
सब अपने आप होता है
मै बस एक आकार हूँ

हे नदी माँ
समुद्र से छोटी होकर भी
समुद्र को जल से भरती हो
बदले में कुछ कभी
लेती भी नहीं हो
जवाब दो माँ
बड़ी तुम या सागर

नदी बोली
सागर को मेरा देना
दिख जाता है
सबको विलीन करना
उसका छुप जाता है
सागर का तो गुप्तदान है
किसी एक को नहीं
सबको समाना नेक काम है
खुद किसी में घुलना
हर किसी को संभव है
सबको विलीन कर
खुद वैसे ही रहना अद्भुद है
सागर तो मेरा उद्देश्य है
राह में मिले उनको बाँटना
छोटासा मिला दायित्व है

हे नदी माँ
मै समझ गई इस बात को
आपके इस कर्तव्य को
निरंतर निभा रहे दायित्व को
आखिर होना कही विलीन है
दायित्व निभाना अनिवार्य है
-  रानमोती / Ranmoti

बेवजह


कभी कभी ज्यादा ज्ञान
डर पैदा करता है
अज्ञानी का ज्ञान ही उसे
निडर दिखलाता है

शोर में हर कोई
चीखता चिल्लाता है
ख़ामोशी में चुप्पी साध
विनम्र दिखलाता है

वजह ढूंढ़कर कई
निर्णय जन्म लेते है
बेवजह तो हम यूँही
खुदको भूल जाते है

बेवजह मन में अगर
कोई विचार पनपता है
तो उसे घटने की संभावना
शत प्रतिशत होती है

कुछ पाने के लिए
सोच तो तभी पाएंगे
जब करने के लिए
कटिबद्ध हो जायेंगे

हमें ज्यादा की
जरुरत तो नहीं
पर जरूरतों से मुँह
फेरना भी नहीं

जिंदगी के अंत तक
कुछ ना कुछ अच्छा हो हमसे
जब हिसाब करने बैठे
बेवजह ना लगे जीवन खुदसे

Monday, December 26, 2022

त्रिलोक सुंदरी

त्रिलोक सुंदरी
मन मोहन पे हारी
जिद पे अड़ी
आई मिलन की घडी
लेके श्याम सी हँसी
ओठों पे रुख्मिणी
तू सज धज के चली
द्वारका आँगन की गली
भाव विभोर
ह्रदय व्याकुल तेरा
बसता संसार
तेरे श्याम में सारा

खनकार सुन पायल की
कान्हा आये प्रेमरथ लेकर
क्या खोया क्या पाया
तूने कुछ न जाना
एक ही लक्ष
कृष्ण अपना माना
लेके श्याम की हँसी
ओठों पे रुख्मिणी
तू सज धज के चली
द्वारका आँगन की गली

मोहन के संग
तू ऐसे चली
जैसे सरिता
सागर से मिली
सूरज की रौशनी
सफर तय कर
धरती को छूने चली
त्रिलोक सुंदरी
मन मोहन पे हारी
जिद पे अड़ी
आई मिलन की घडी

- रानमोती / Ranmoti

Monday, December 5, 2022

सभ्यता


वो पौधा कल खिला था
कुछ दिन प्रकृति से लढा था
फिर एक दिन हार गया
शायद किसीने कुचल दिया

वो वृक्ष भी गहरा होता पीपल तक
अगर किसीने सींचा होता जड़ोंतक
उसकी रगो में भी हौंसला भरा होता
उसका सामर्थ्य अगर पहचाना होता

न जाने देश के कितने घरों में
मुरझा गये वो कोमल फूल
जो अनदेखे रहे इस जहाँ में
किसीकी नजर के इंतजार में

वो भी बन जाते देश की शान
अगर किसीकी एक आवाज
पोहचती उनकी जड़ोंतक
कहती उठो पोहचो मंजिल तक

इस नोटंकी भरे जीवन में
देश की पीढ़ी कभी ना फसती
अगर पुरातन सभ्यता बताई जाती
शान से हरतरफ लहराई जाती

अगर हम समझकर पोहचते
भारतीय सभ्यता की जड़ोंतक
हर जीवन खिलता पनपता
किसी के अन्याय से कभी ना डरता

- रानमोती / Ranmoti

Sunday, December 4, 2022

कुपोषित आँखों से


कुपोषित आँखों से
जग देखने चला मै
कमजोर पैरों से
रेंगने चला मै

दबे कंधो से
लड़ने चला मै
भीगी आँखों से
रोने चला मै

भूख के दर्द से
बोलने चला मै
खाली थाली से
खाने चला मै

फैले हाँथो से
क्या मांगू मै
गिरने के डर से
कैसे उठु मै

सब गिर जाएगा
सँभालने से पहले
हौंसला टूट जायेगा
बढ़ने से पहले

चमकते तारो से
अक्सर शिकायत है
जो मेरी किस्मत से
मुझे चिढ़ाते है

भूख का काजल
झलकता आँखों में
सदियों की भूख
संचित मेरे हृदय में

कैसे लगेगी नज़र
माँ तेरे बछड़े को
जिंदगी खपा जिसपर
खुद तैयार हँसने को

कुपोषित आँखों से
जग देखने चला मै
कमजोर पैरों से
रेंगने चला मै

- रानमोती / Ranmoti

Thursday, November 17, 2022

स्वयंवर



जीत और हार दो सिरा पर
खड़ी थी वरमाला संग
स्वयंवर रचाया पिता कर्त्तव्य ने
देखे सबके गुणों के रंग
अधिकार था दोनो को
चुने अपना वर
अनिवार्य था कर्म उसमें
हो सबसे ऊपर
जीत के मन को भाता
वही वर हौसलों के गीत गाता
इच्छा जिसकी प्रबल हो
कर्म विजय से प्रभवित हो
बस वही मेरा वर हो
जीत की वरमालाये
पड़ेगी उसके गले में
जो दौड़े के स्वयं
मशगूल रहे मंजिलो में
हार का तो बस हा हा कार था
उसका ही स्वीकार सर्वोतोपरी था
जिसके हौसले थे टुटे
जिसकी आँखो में स्वप्न थे फूटे
मन ही जिसके कर्मो को लुटे
वही वर से हार का इंतजार मिटे
अब आप के प्रदर्शन पे निर्भर है
कोन बनेगा हार का मीत
कोन बनेगा जीत का मीत
जीत और हार का चुनाव ही
है हर इंसान के जीवन की रीत

- रानमोती / Ranmoti

Friday, November 11, 2022

द्विप अंडमान

स्थलखंड का एक अंग
जल से घिरा चारो छोर
अलग-थलग मातृभूमि से
सागर में नर्तक मोर

शांति सुकून से संपन्न
क्रान्तिशूरों से भूमि पावन
गहरे वनों की गुफावों में
प्रकृती की आस राहों में

पेड, पौधे, पशु, पक्षी
आद्य सुंदरी कला नक्षी
जरावा, ओंगेस संग नेग्रि
नीलम तट और आग्नेयगिरि

गहरे पुष्प फल श्रीफल
प्रकृति की गोद निर्मल
सुंदरता की श्रेष्ठ पहल
अंडमान द्वीप एक चहल
- रानमोती / Ranmoti

साक्षात्कार



पुराने नये साहित्य के कर्कट में खोजकर
सत्य से लथपथ मोतियों को चुनकर
नये साहित्य का प्रणयन कर
नई पिढी को नए मार्ग प्रदान कर

जो अनुभवो का साक्षात्कार हुआँ
उन्हींको साथ लेकर बढ़ना है
साक्षात्कार के विपरीत चलने से
कलियुग की अनुभुती निश्चित है

समय पुराना या नया नही होगा
सत्य पुराना या नया नहीं होगा
विद्युत का विपरीत प्रवाह होगा
बस गौर से परखना होगा

जीना जिवन है अगर पुरा जिया जाये
मृत्यू आनंद है अगर जीना छोड़ा जाये
मूढ़ ही है ज्ञानी जो आत्मघात कर लेता है
श्रेष्ठ है जड़ जो यन्तणा सह जी जाता है

- रानमोती / Ranmoti

जीवन संगिनी



रचके तुलसी चरणों में तेरे
हो गई पावन मै तो सांवरे
सुगंध ऐसा चढ़ा सांवरे को
जग भूल गया मनमोहन
मै ना राधा दिवानी
मै ना मीरा दिवानी
मै तू हूँ रुख्मिणी
तेरी जीवन संगिनी

तुलसी से तेरा संजोग दिन का
मीरा तो स्वर है अकेले मन का
प्रीत में राधा जैसे बजती पायल
सोच के मन मेरा होवे घायल
मै ना राधा दिवानी
मै ना मीरा दिवानी
मै तू हूँ रुख्मिणी
तेरी जीवन संगिनी

राधा तो तेरी बतिया कान्हा
मीरा भये पानी से नैना
सुख में राधा दुःख में राधा
मोहन जो धन तेरा अब हो रहा मेरा
मै ना राधा दिवानी
मै ना मीरा दिवानी
मै तू हूँ रुख्मिणी
तेरी जीवन संगिनी

- रानमोती / Ranmoti

कारीगिरी


हे कारागीर,
तुम बस अपनी कारीगिरी पर ध्यान लगाना
तुम्हे अपना हुनर है आजमाना
भूल जाना दिन है या रात
डूब जाना अपने लक्ष के साथ
शिल्प कौशल की कला
हाथों में लेकर तू निकला
करुणा के साथ उतर जाना
नई धरोहर का परचम लहराना
हे कारागीर
तुम बस अपनी कारीगिरी पर ध्यान लगाना
तुम्हे अपना हुनर है आजमाना
प्रेम इतना भरना
की पत्थर भी जीवित हो उठे
खाकर तेरे अनगिनत घाव
सदा तुझ संग रहे डटे
अपनी चेतना को बनाकर हथियार
तू शिल्प पे उतार दे अनेक भाव
वो पत्थर सुन्दर मूरत बनकर जब सजे
रंगो से भरना उनमे प्राण
समर्पण तेरा इतना हो
उस मूरत में भी तेरी सूरत हो
तेरे हाथो के रक्त की एक एक बून्द
विभिन्न रंगो में समावेशित हो
रंग ऐसा चढ़ जाये उसपर
हर तरफ बस तेरी ही पुकार हो
हे कारागीर,
तेरी कारीगिरी अमर हो ऐसा जोर लगाना
तुम बस अपनी कारीगिरी पर ध्यान लगाना
तुम्हे अपना हुनर है आजमाना
  
- रानमोती / Ranmoti

मधुर वचना


करुणा से भरके खिले
दो कमल नयन
प्रेम की नदियों से छलके
दो मधुर वचन
वो कमल नयना
वो मधुर वचना
तू सुख का कारन
हर कष्ट निवारण

चंदा की रोशनी
है तेरी परछाइयाँ
गुलाबोंसी रंगीन
लाबों की पंखुड़ियाँ
वो कमल नयना
वो मधुर वचना
तू सुख का कारन
हर कष्ट निवारण

दुःख की झीलों में
खिलता चला
हाथो की रेखावों में
तारो सा सजता चला
अहोभाग्य का तू शिखर प्रभु
मैं नमन तेरे चरणों में देखु
वो कमल नयना
वो मधुर वचना
तू सुख का कारन
हर कष्ट निवारण

- रानमोती / Ranmoti

Wednesday, October 19, 2022

अतुल्य वाद्य


बंसी पूरी खाली खाली
फिर भी बोले मधुर बोली
ना तुझमें कोई गांठ है
ना कही भाये आठ है

बिन बजाये तू ना बजती
कृष्ण के सुन्दर होठो पे सजती
सांसो की फूँक बनकर
तुझमे विराजित खुद परमेश्वर

मधुर नाद तेरी निपुणता
तू निर्गुण तू ही सगुणता
तू सिखलाती जीवन आशा
तेरी मधुरता मदहोश निशा

ईश्वर जो तुझमे घोले
संगीत बन तू सृष्टि से बोले
तेरी चतुर निरंतर भाषा
जीवन पाये नई दिशा

तेरी कठोरता भी मंजूर है
तेरे कर्म जो ईश्वर के समीप है
है बासुरी तू एक अतुल्य वाद्य है
कृष्ण संग तेरा अदभुत मिलाप है

- रानमोती / Ranmoti


Thursday, September 1, 2022

शिउली

मानों मै शिउली का
रम्य प्रसन्न तटस्थ तरु
रचनाये मेरी उसके पुष्प
सुगंधित प्रभात करे शुरू

वो खिलकर मुझसे
लुढ़कते है जमींपर
सुन्दर मधुर सुरभि
महकाते है सृष्टिपर

कोई समेट हाथो में
सौरभ से भर जाता
तो कोई कुचल पैरोंतले
अनभिज्ञ अग्र निकल जाता

रचनाये फूल है मेरी
कभी ना करती भेद
हर किसी को महकाती
जैसे जीवन में वेद

उठाने वाले कुचलने वाले
दोनों को एहसास दिलाती
उनकी रास्तों में सजकर
मोतियों भाँति उन्हें सजती

सीधी साधी हलकी फुलकी
शिउली बन हुनर आजमाती
हंसती मुस्कुराती रचनाये मेरी
किसी-न-किसी मन को भाती
- रानमोती / Ranmoti

Wednesday, August 31, 2022

आँगन

सज़ा दूँ मै तेरा आँगन कितना
धरती का आसमाँ से नाता जितना
फ़ुल खिलेंगे शनैः-शनैः बातें करेंगे
रंग फ़िज़ावो में उमदा मौज भरेंगे

तोता भी आयेगा कोयल भी गायेगी
चिड़ियों की मधुर पाठशाला भी होगी
पंछियों की अपनी ही दुनिया सजेगी
छोटे छोटे गमलों से उनकी प्यास बुझेगी

रंगबिरंगी पोशाखो में तितलियाँ आयेंगी
जीवन गीत रंगो का पंक्तियाँ सुनायेंगी
अष्ट दिशाओं में सुनहरी धूप परछाईं होगी
विभिन्न फल और पुष्पों की नुमाइश होगी

तिनका तिनका जिंदगी बढ़ती जाएगी
पैरो तले शान से खुशियाँ मंडराएगी
सज़ा दूँ मै तेरा आँगन कितना
धरती का आसमाँ से नाता जितना
- रानमोती / Ranmoti

Monday, August 29, 2022

तरह

दिन बरसते बारिशों की तरह
एक तरंग ख़ुशबू फूलों की तरह
धूप छाँव लहराती परदों की तरह
प्रकाश से सजी धरती नदियों की तरह

चेतना सरसराये पत्तों की तरह
मन महकाये ऋतुओं की तरह
चेहरा खिलखिलाये चाँद की तरह
जीवन झिलमिलाये सूरज की तरह

साल निकलते लमहों की तरह
याद रह जाये कहानी की तरह
पहल करायें नई साँसों की तरह
जीना सिखलाये अजनबी की तरह
दिन बरसते बारिशों की तरह
- रानमोती / Ranmoti

Saturday, August 27, 2022

विज्ञान के गुरुवर्य

हे विज्ञान के गुरुवर्य
तू आग के पंख लगाकर
विज्ञान का सेहरा सजाकर
उड़ गया जिस मंज़िल तक
उस मंजिल तक हमें भी पहुंचा दे
हे विज्ञान के गुरुवर्य
हमें भी कलाम बना दे

हे विज्ञान के गुरुवर्य
जो रहे तुम्हारे अधूरे ख़्वाब
पूरा करेंगे उन्हें सब नन्हे नवाब
तू बस उनका पता बताकर
इस जंगल में आग लगा दे
हे विज्ञान के गुरुवर्य
हमें भी रमन बना दे

हे विज्ञान के गुरुवर्य
ये देश बने आविष्कारों की भूमि
हर देशवासी रहेगा तुम्हारा ऋणी
उन आविष्कारों की भनक लगाकर
तू बस सोच की तिल्ली जला दे
हे विज्ञान के गुरुवर्य
हमें भी सत्येन्द्र बना दे

हे विज्ञान के गुरुवर्य
देना हमें उन रास्तों का नक्शा
जिनकी बदौलत हो देश की रक्षा
भारत की आँखों में उम्मीद जगाकर
तू हर खोजी को आशीष दिला दे
हे विज्ञान के गुरुवर्य
हमें भी भाभा बना दे
- रानमोती / Ranmoti

Wednesday, August 24, 2022

छलांग

तुझसे क्या छिपा है
जो तू पीछे है अबतक
अकथित जो मंत्र है
रूठेंगे तुझसे कबतक

जीवन के रहस्यों को
सुन उनकी शब्दों में
अनकहे किस्सों को
ढूँढ उनकी किताबों में

तेरी अतृप्त भूख तू
जल से मिटा मत देना
पंच-पकवान की आस तू
यूँ ही छोड़ मत देना

उसकी सुगंध सूंघकर
रास्ता ढूँढले अनजान
तेरा भी हक़ है उसपर
पेटभर चख ले अरमान

रास्तों पर कठनाईयाँ
सुनकर रुक मत जाना
ज़िद रख उन्हें लाँधकर
तुझे मंजिल को है पाना

तू भी अंश है प्रकृति का
बात यह सुनिश्चित कर
सबको कवच है नियति का
तू देख उठाके नजर

दुसरो की जय से पहले
अपनी विजय निश्चित कर
वक्त पर मार छलांग
अन्यथा पछतायेगा जिंदगीभर
- रानमोती / Ranmoti

Friday, August 19, 2022

विरचित विजय

एक कालखंड महान षड़यंत्र
सेनापति कैसे बना राजन्य
इतिहास में लिखित कानमंत्र
विरचित विजय ना कुछ अन्य
ढाई सौ सालो का राज्य
एक सच्चे राज्य का नाज
प्रफुल्लित थे राजाधिराज
सोचा राज्य को देंगे शाबाशी
बाँटी जाये प्रजा में ख़ुशी
साथ ही हो विरो का सन्मान
सेनापति को भी मिले मान

मगर,
मौका फिरस्त था सेनापति
मन में कपट ज्वाला भाती
सोचा राजा को है मुझ पे नाज
क्यों ना छीन लू मै सरताज
शुरू की अपनी चतुराई
हर फितूर को दी लुगाई
एक साथ सब गद्दार जमाये
राजवंश ने सालो में गवाए
धोका तो खून में था
सेनापति का वंश ही फितूर था

फिर,
वह उत्सव की घडी आई
राज्य में हरतरफ थी रोशनाई
राजाने दी प्रजा को बधाई
हर वीर को मिली अपनी शाई
सेनापति का मन बेचैन था
ग़द्दारों में वह अव्वल था
भरे उत्सव में उसने ठानी
होगा राजा आनंद में धनि
तब लिखूंगा मै अपनी कहानी
राज्य में छाएगी अनहोनी


सेनापति,
मन में ले कपट ऐसा झपटा
विष का नाग जैसे लिपटा
भरी सभा को उसने बाँटा
मन में बोया युद्ध का काटा
सभा को झूटी कहानी बताकर
अघटित को घटित समझाकर
अपने साथियों से मिलकर
झूठे दुश्मनो की कहानी रचकर
चतुराई से की अपनी मनमानी
राजासे करवादी एक नादानी
राजा युद्ध को तैयार न था
उसको थोड़ा अंदेशा था
यह कोई सोची समझी चाल है
अपनाही पहना गद्दारी की खाल है

लेकिन,
अब ना कोई रास्ता था
प्रजा की सुरक्षा का वास्ता था
विवश होकर सेना को
दिया युद्ध का आदेश
प्राणो से प्रिय थी राजा को
अपनी प्रजा और स्वदेश
सेनापति मन ही मन ललचाया
अपनी साजिश का अंत युद्धमे पाया
उत्सव की सभा बनी युद्ध की ललकार
सेनापति ने बुलंद की अपनी तलवार
पर नाम उसपर दुश्मन का ना था
राजा का अंत बस जहन में था

अंतत:
अनचाहे युद्ध का आगाज हुआ
राजा संग सेना का तिलक हुआ
निकल पड़े मैदान में
झूठे दुश्मनों की खोज में
फसते गए शिकारी के जाल में
पड गई अमावस्या की काली छाया
असत्य ने डाली अपनी काया
आगे मनघडन दुश्मन था
साथ फितूर सेनापति का राज था
दुश्मनों का वार सहने से पहले
युद्ध का आगाज होने से पहले
गिधड बैठा आँख लगाकर
सही समय पर तीर चढ़ाकर
कर दिया अपनेही राजा पे वार
सेनापति था वह फितूर गद्दार
अपनेही राजा के पीठ में खंजीर चलाया
युद्ध में मारा गया प्रजा को जताया
स्वयम को सम्राट घोषित किया
अब वही मालिक सबको समझाया
राजवंश का पूर्ण नाश हो
बस उसकी ही जयजयकार हो
इसकदर सबको धमकाया
एक अकेलाही नायक भाया

पश्चात्
वीरता की झूठी गाथा लिखकर
मनघडन साहित्य से बहुश्रुत होकर
प्रजा में जबरन नायक कहलाया
इतिहास के पन्नोंपर वो छाया
उसके राज्य में असत्य पनपता
हरतरफ गद्दरों का गुणगान होता
प्रजा समक्ष नितांत बलवान दिखाता
गद्दार सेनापति अब राजा कहलाता
आगे चलकर फितूर साहित्यकारोंने
उसे राज्य का भगवान बना दिया
इसी तरह विरचित विजय अजय हो गया
एक सच्चे राज्य का विध्वंस हो गया
- रानमोती / RANMOTI

एक दिन की समस्या


दूर दराज़ जंगल के पार
बस्ती थी मेरी और परिवार
सुन्दर नदी पेड़ों की मुस्कान
बाढ़ का साया हरसाल तूफान
एक टुटाफूटा घर मानो छाले पड़े
जीवन पनपता उसमे जैसे वृक्ष खड़े
हर दिन नया सवेरा जीने की आस थी
एक डरावने दिन और रात की बस बात थी

माँ की सांसो को हर पल हृदय नाप रहा था
नौ महीनो से सृष्टि की चाहत में तरस रहा था
शायद वह आखरी दिन था माँ की कोख में रहने का
उसकी भी चाह थी मै बाहर आऊँ आनंद लू जीवन का
माँ तड़प रही थी दर्द से मदद मांगती किसी मर्द से
शायद वह मेरा बाप था जो व्याकुल था मेरी उम्मीद से
उस टूटीफूटी झोपडी में बारिश गंगा रूप बरस रही थी
बाढ़ और तूफान से बस वही एक सबका सहारा थी

बड़ी कठनाई संग माँ की कोख छोड़ पैदा हुआ
पहिली बार किसी अनछुये स्पर्श का एहसास हुआ
आँखे खोलू की ना खोलू समझ में ना आया
दुनिया में दिन पहला था या आखरी जान ना पाया
एक माई आकर बोलने लगी यह बचेगा नहीं
यहाँ का माहौल इसे इसकदर जचेगा नहीं
चलो ले चलो इसे अस्पताल नदी पार कही
जहा मिले इसे सुविधा डाक्टर और इलाज सही

आँखे खोलने ही वाला था पर मै घबरा गया
सोचा खोल के भी क्या करू जब वक्त निकल गया
एक दिन की दुनिया की मोहब्बत में पड़ जाऊँगा
जो पाया नहीं देखा नहीं उसे भी पल में खो जाऊँगा
इस कश्मकश में जीवन की एक घड़ी बीत गई
चाह थी रोशनाई की अंधियारे संग मिटती गई
अचानक दो चार बस्तीवाले जमा होकर पास आये
एक झोली में डाल मुझे अपने साथ ले गये

शायद उन्हें नदी पार कर मुझे ले जाना था
बाढ़ तो मानो धरती पर निरंतर झरना था
लड़खड़ाते पाँव ले गये आखिर किनारे तक
दूसरी घड़ी भी बीत गई इंतजार में तब तक
मौत मंडराती रही जिंदगी घुटने टेक रही थी
आरोग्यसेवा ठप्प थी दरबदर सन्नाटे की गंध थी
सब छाती पिट हताश हो बस्ती को कोस रहे थे
कहानी ये उन सबकी हरसाल बस सोच रहे थे

आशा निराशा में बदल गई जब तीसरी घड़ी आई
हर किसी की उम्मीदों पर मातम की परछाई
ठण्ड से रोम रोम मेरा कांप सिकुड़ रहा था
भूख के मारे पेट ज्वाला बन तड़प रहा था
रोने का मन किया सोचा इन्हे बोल दूँ
अपनी मासूम सी भूख अब खोल दूँ
फिर मन ही मन मुस्कुराया और
खुदसे ही बोला सुन ज़रा रुक
एक दिन की तो समस्या है
बस एक दिन की समस्या

-रानमोती / RANMOTI
{महाराष्ट्र के पालघर जिले की बालमृत्यु घटना से प्रेरित}

Wednesday, August 17, 2022

कण कण कान्हा


स्मित निर्दोष ब्रम्हाण्ड व्यापक
सिद्ध समृद्ध आनंदमय ऊर्जा
मन मन स्थित कण कण कान्हा
मोरपंख श्रुत अलंकार कृत शृंगार
तू जीवन तू आदर्श तू ही उपकार
कर्णकुंडल नभमंडल तू यज्ञ सर्वज्ञ
नेत्र चक्षु मन भिक्षु तू रक्षु कान्हा 
हे निराकार कर उद्धार बन कगार
जग तेरा निकुंज तू माली नंद मुकुंद
नयन पंकज पुष्प प्रेमरस भरे
दर्शन मात्र मोक्ष भय सारे तू ही हरे
मन मन स्थित कण कण कान्हा

- रानमोती / Ranmoti

Monday, August 15, 2022

धरती

बिन बादल तरसे रे
मोती मोती बरसे रे
धरती तो जुडी हुई
अंबर संग मिली हुई

उसकी तो नियति रे
अंधियारे को क्षति रे
बिन सूरज नहीं रे
उजियाले की ख्याति रे

प्रकृति से खिली हुई
जीवन को फुलाती गई
उसकी तो नाव है
जीवन हुआ सवार है

यात्री वो इंसान है
जीना जिसका काम है
कर्मो को बांधो गले रे
ख़ुशी ख़ुशी चलो रे
- रानमोती / Ranmoti

Tuesday, August 9, 2022

सजदा

सजदा तुझे हे अंबर के खुदा
तू मेरे रोम रोम में बसे सदा
कितने जतन करू तुझे पाने के
कैसे अवसर धुंडु तुझमें समाने के
इन काली घटाओ से तुझको ताकू
तू मुझमें छुपा कैसे परिचित हूँ
दे सबूत तेरे होने का
बतलादे क्या कारन मेरे रोने का
सजदा तुझे हे अंबर के खुदा

कभी काली घटा कभी चमकता तारा
कब तक फिरू तेरे दर्शन का मारा
बता तू कहाँ खामोश है
तेरी पहेली इस प्यासे को सजा है
हे दयावान हे विश्वरचित
प्राण देह में अब हो विरचित
उससे पहले तू हो विदित कर प्रमित
सजदा तुझे हे अंबर के खुदा
तू मेरे रोम रोम में बसे सदा
- रानमोती / Ranmoti

Sunday, August 7, 2022

संचित

(भारतीय सेना के वीर जवानों को समर्पित)

थोड़ा वक्त है ?
तो ठहर जाओ
ह्रदय में संचित है
कुछ सुनते जाओ
जीवन के मेरे किस्से
अगर सुनना चाहो
भारत माता की जय
गीत गाते रहो
मै रखवाला हूँ देश का
दुश्मन ललकारे कहकर
अरे ऐ तिरंगेवाले भेस का
उसकी जुबाँ गुर्राकर बोली
दम है तो आगे बढ़
है वतन से मोहब्बत
तो ये खड़ा हिमालय चढ़
उसकी बात सुन
ज्वालासा भड़का मेरा क्रोध
पल में ही बन गया
मै नेताजी सुभाषचंद्र बोस
टूट पड़ा दुश्मनोपर
जैसे बम के गोले
याद दिलादी उन्हें
गब्बर की शोले
सीना मेरा झुका नही
क्रोध मेरा रुका नही
डर के मारे दुश्मन
दबके बैठा बिल में
भगत सिंह की कहानिया
भरी पड़ी मेरे दिल में
मै गिर के जंगल का
शेर बन ऐसा गरजा
सह्याद्रि के नागों सा
काटने दौड़ा
उत्तराखंड के बादलोंसा
धो धो बरसा
दुश्मनों को बहाकर
ले गया मन्दाकिनी की तरह
लाशों के ढ़ेर बिछा दिए
समशान घाट की तरह
दुश्मन मेरा पाकिस्तान
चीन चित्र विचित्र
पर मै भारत माँ का
सच्चा हूँ सुपुत्र
ये समंदर ये आसमान
है मेरे मित्र
चन्द्रगुप्त शिवराज
रगो रगो में चरित्र
आँखों में खून खौलता गया
दिलमें जोश भरता गया
मातृभूमि का जयजयकार
ना इससे बड़ा कोई अवसर
सुनकर मेरे वतन का नारा
टूटटूट कर दुश्मन हारा
तिरंगा मेरे हाथ में
हर क्रांतिवीर मेरे साथ में
फ़तेह कर झंडा मैंने
उनकी जमीनपर ऐसे गाड़ा
नापकों को ढ़ेर कर
वसूला मेरे भूमि का भाड़ा
जीत कर युद्ध को
बढ़ा दी देश की सरहद
अब बस इस जमीन पर
मेरे वतन की हुकूमत
मेरे वतन की हुकूमत
- रानमोती / Ranmoti

साहित्य


मेरी क़लम ही
मेरी चूड़ियाँ खनकती
उच्च विचार श्रवणीय
बालियाँ झूलती
अमृत वर्षा करनेवाले
मधुर मेरे शब्द
लाली का रूप लेकर
लबोंको सजाते है
बदलाव क्रांतिवाला
मेरा पोशाक
तन पर चढ़ते ही
अपना रंग जमाता है
हाँ मै वही
दिव्य नारी का रूप हूँ
जिसे समझने को
हर कोई बेताब है
कोई इतना आमिर कहाँ
मेरे शृंगार को समझ ले
कोई इतना दिव्य कहाँ
मेरे गुणों को परख ले
ना ये बाज़ार के
चौराहे पर बिकते है
ना ये साधारण
नज़रिए से दिखते है
अनन्य दृष्टी से
अंकुरित साहित्य है
समझ के परे
अंजन अपेक्षित है

- रानमोती / Ranmoti

मेरे सपने

आस के आरजू पर बुने हुए फूल
बहते हुए झरने की धाराएं कुल
रेशमी खुशियों के दामन वो गुल
इन्द्रधनु के सप्तरंग कहलाते
मेरे सपने

मधुर संगीत की तरह राहत भर जाते
निराशा के गुब्बारे तोड़ हवासे लहराते
नई उमंग नई शुरवात अंकित कर जाते
मै जहाँ भी रहूँ उस जहाँ ले जाते
मेरे सपने

कुसुम की सुगंध से नित्य महकते
नन्हे पाँव जमीं पर ऐसे थिरकते
कहानी को अंजाम तक ले जाते
पल में भंग कर रंग जमाते
मेरे सपने

मंजिल तक पहुँचाती सिढीयोंसे खरे
इच्छापूर्ति की अनुभूति से परे
राजमहलों की कहानी से घिरे
बिन प्याले मदिरा की नशा चढ़ाते
मेरे सपने

ना स्वस्त ना परास्त है पुकार
ना स्वार्थ ना द्वेष है हितकार
ना आकार ना उकार है निराकार
ना अंत ना आरंभ हो अनंत साकार
मेरे सपने
- रानमोती / Ranmoti

Thursday, August 4, 2022

कल्प कल्प

तू कल्प कल्प स्थित संगम है
तेरे सिवा जीवन वर्जित है
तोड़ के बंधन आना यही है
तेरे नाम परे संसार नहीं है

बन के मूरत ऐसे सजू रे
पैरो में पायल ऐसे गुंजू रे
नैनों में काजल ऐसे मलू रे
याद में तेरी पल पल गिनू रे

दर्पण का ना काम हो कान्हा
आँखों में देखू रूप सुहाना
तुझ संग जीवन मैंने माना
पधारों अब वक्त ना बिगोना

तू कल्प कल्प स्थित संगम है
तेरे सिवा जीवन वर्जित है

- रानमोती / Ranmoti

Sunday, July 31, 2022

अंबर का तारा

अंबर का तारा
अँधेरे के द्वार खड़ा 
अँधेरे ने पूछा 
क्योँ मेरे ही पीछे पड़ा
मेरा जीवन जैसे 
काली रात का घड़ा
सुनकर मासूम तारा
मन ही मन मुस्कुरा पड़ा 
जवाब में उसने 
अपना खाता खोला 
प्रकृति के खेल में 
बना मैं चमकीला 
नहीं काम का मेरे 
सूर्य का उजियाला 
अँधेरा ही बना देता मुझे
जहाँ में सबसे निराला
जिसकी आँखों ने देखा 
खेल तेरा अँधियारा 
वही देख पाता है 
यह अंबर का तारा 

- रानमोती / Ranmoti

Saturday, July 30, 2022

मनमौजी


मनमौजी चाहता है कुछ खोजा जाये
चाँद के उस पार जमीं के गर्भतक
परंपरा को तोड़कर नए रहस्य जोड़कर
कबीर के दोहो में सिद्धार्थ के मार्गपर
मीरा की सरगम में मोहन को सोचा जाये
मनमौजी चाहता है कुछ खोजा जाये

समंदर की लहरें चाहती है कुछ कहना
पेड़ों पत्थरों को कुछ अपना है जताना
लहरों की प्रलेखपर उनकी जुबाँ लिखी जाये
वसुधा की क़ोख छोड़ समंदर में घोला जाये
मनमौजी चाहता है कुछ खोजा जाये

आशा निराशा मान अपमान गठरी में बांधकर
कुछ नासमझी सी मंजिलों को लाँधकर
सीमाओं को असीमित रूप से स्वीकारकर
अघटित को यथार्थ का मौका दिया जाये
मनमौजी चाहता है कुछ खोजा जाये

जीवन नया है हम भी नये हो
ज्ञान का विनिमय गुरु शिष्य से परे हो
रहस्यों का छलावा बस पारदर्शी हो जाये
जीवन को जीने का नया मौका दिया जाये
मनमौजी चाहता है कुछ खोजा जाये

- रानमोती / Ranmoti

Thursday, July 28, 2022

अपरिहार्य

नित्य, नैमित्य, निष्काम संचित
रूपों में विभाजित हूँ मै कर्म
प्रारब्ध में अवतरित होकर
अंततः संस्थापित हूँ मै कर्म

मर्त्य की पराकाष्ठा उद्यम कर
नतीजतन निष्कर्ष हूँ मै कर्म
अभ्युदय: निःश्रेय प्राप्ति का
स्वयंरचित योग हूँ मै कर्म

भुत भविष्य वर्तमान का
सृजन मिलाप हूँ मै कर्म
गीता से सयंभु प्रकट
समूचा तात्पर्य हूँ मै कर्म

धर्म से भी बड़ा ईश्वरीय
अपरिहार्य पथ हूँ मै कर्म
सुख दुःख प्राप्ति का संयोग
मनुष्य को अपरिहार्य हूँ मै कर्म
- रानमोती / Ranmoti


Monday, July 25, 2022

अनुपम

तू हाथ उठा दे अनुपम
वनराज के भाती
नजर भिडादे अनुपम
वनराज के भाती
अगर हो
अहन पर आघात
खड्ग उठाके
तू कर प्रहार
तू हाथ उठा दे अनुपम
वनराज के भाती

तेरे वित्त की ना हो चोरी
कल की भोर भी हो तेरी
अवनि जित ना ले बैरी
यज्ञांगी मोहित और सुनहरी
उससे पहले
तू हाथ उठा दे अनुपम
वनराज के भाती

भवसागर विजय लिखित
मस्तिष्क दिव्य तेरा
घन से घना
कष्ट में उजियारा
विजयपथ की
एकमात्र अभिलाषा
ना कल हो
दिवाकर की निराशा
उससे पहले
तू हाथ उठा दे अनुपम
वनराज के भाती
नजर भिडादे अनुपम
वनराज के भाती

- रानमोती / Ranmoti




Saturday, July 23, 2022

बुद्धि को ग्रहण या आच्छादन


हिंदी भाषा में ग्रहण शब्द का अर्थ होता है धारण करना, स्वीकार करना या फिर किसी चीज को खा जाना। अगर यह अर्थ सही है, तो सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण का मतलब सूर्य या चंद्र को खा जाना या धारण करना इस तरह निकाला जा सकता है। सदियों पहले जब मनुष्य को सूर्य और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारन पता नहीं थे, तबतक यह कहना ठीक था की सूर्य या चंद्र को सृष्टि की कोई और चीज निगल लेती है फिर खा जाती है। लेकिन अब जब इंसान को वैज्ञानिक सफलताओ के चलते, यह पूरी तरह पता है की सूर्य और चंद्र ग्रहण एक प्राकृतिक घटना है, और यह घटना पृथ्वी और चंद्र के एक दूसरे के बिच में आ जाने से उत्पन्न होती है। संक्षिप्त में हम इसे आच्छादन कह सकते है। ग्रहण शब्द का यहाँ पर कोई भी अर्थ या मतलब न होकर आच्छादन यह अर्थपूर्ण शब्द कहा जा सकता है।

पुराने कालखंड के अनुसार ग्रहण यह शब्द कुछ बनावटी कहानियों के चलते 'नकारात्मकता' से उभरा हुआ प्रतीत होता है । लेकिन वास्तविकता में ग्रहण यह शब्द एक स्वीकृति दर्शाकर 'सकारात्मकता' प्रस्तुत करता है। हम आज भी बोलते समय किसी नकारात्मक चीज को दर्शाने के लिए 'ग्रहण लग गया' इस उपमा का इस्तेमाल कर लेते है। जबकि इसका सही अर्थ या मतलब 'किसीको स्वीकृति लगना' होता है। इसी भाषा या उपमा को समझकर बोले तो हम यह कह सकते है की मनुष्य की 'बुद्धि को ग्रहण' लग गया, की वे आजतक बिना मतलब ग्रहण शब्द का इस्तेमाल किये जा रहा है। मेरी समझ से कहूँ तो 'मनुष्य बुद्धिपर आच्छादन है' जैसे की 'चंद्र आच्छादन', 'सूर्य आच्छादन' होते है।

- रानमोती / Ranmoti

लापता

तू समन्दरसा खिलखिलाता है 
फिर भी अनदेखा सा कही 
मै तुझमे समाई हूँ पूरी 
तू लापता है मुझमें कही 

- रानमोती / Ranmoti

Friday, July 22, 2022

हे मातृभूमि

सागर से मोती चुन के लाएँगे
हे मातृभूमि
हम फिर से तुम्हें सजाएँगे

आए आँधी फ़िकर कहाँ है
आए तूफ़ान फ़िकर कहाँ है
तेरे प्यार में जीते जो यहाँ है
सैलाब से भी लड़के आएँगे
हे मातृभूमि
हम फिर से तुम्हें सजाएँगे

फ़क़ीर होने की पर्वा नही है
मरमिटने की पर्वा नही है
तेरे नाम के नारे लगाते जो यहाँ है
देशभक्ति से अमिर हो जाएँगे
हे मातृभूमि
हम फिर से तुम्हें सजाएँगे

नंदनवन हो तेरी ज़मीन
सारे जहाँ को हो तुझपे यक़ीन
तेरे मिट्टी से तिलक लगाता जो यहाँ है
उस तिलक की कसम सबको जगाएँगे
हे मातृभूमि
हम फिर से तुम्हें सजाएँगे

सुंदर तेरी मूरत सजे
तू नई नवेली दुल्हन लगे
तेरे आँचल से बंधे जो यहाँ है
मिलके विश्व मे तिरंगा लहराएँगे
हे मातृभूमि
हम फिर से तुम्हें सजाएँगे
सागर से मोती चुन के लाएँगे
- रानमोती / Ranmoti

Wednesday, July 20, 2022

भेस


शायरी और गझल के भेस में हम आते नही
जहा सब पाए जाते है वहा हम होते नही
- रानमोती / Ranmoti

रंगीनियत


मेरे चेहरे की रंगीनियत से पूछो 
जिक्र से तेरे रंगीन हो जाती है 
वजह बस तेरे साथ होने की है 
वो और भी बेहतरीन हो जाती है
- रानमोती / Ranmoti

Tuesday, July 19, 2022

बेहोशी

कोण है जो तुझे इतना चढ़ा रहा है
चढ़ना ही है तो खुदके दम पर चढ़ 
किसी और के आवाजों की बेहोशी 
तुझपर ज्यादा देर तक नहीं रहेगी
- रानमोती / Ranmoti

परतो

परतो से बनी जमीन 
परतो से बना आसमा 
परतो से बने रास्ते 
परतो से बना जीवन 

- रानमोती / Ranmoti 

Friday, July 15, 2022

प्रकृति


ऐ काफिलों,
तुम क्या जानो मोल मेरा
मै तो तुम्हारी दुनिया ठुकरा दू
ये धरती मेरी,ये आसमा मेरा
हवा सी लहराके चलु
प्रकाश को रंगसा सजाकर
मै काली रात का
सूरज बन जाऊ
ज्वाला सी उबलू
सागर का जल पीकर
खुद को चट्टान बना दूँ
फिरभी फूलो सी सुन्दर होकर
दुनिया को मेहका दू
खुदका स्वीकार ही धर्म मेरा
करना पहचान हासिल कर्म मेरा
मृत्यंजय हो स्वाभिमान मेरा
कदापि ना हो अपमान मेरा
मै काल के परे काली
आदि अनंत माया
लक्ष्मी की लेकर काया
धन का मै स्त्रोत बनु
चिर के अज्ञान की छाया
ज्ञान की मै तलवार बनु
भटका मुसाफिर जल मांगे
उड़ता पक्षी घर मांगे
जिसने पा लिया मुझे
वो मेरे सिवा कुछ ना मांगे
मै प्रकृति जगत जननी
जीवन का उगमस्थान कहलाती हूँ
हे नारायण तुम क्या वर दोगे
मै खुद ही एक वरदान हूँ

- रानमोती / Ranmoti

यथार्थ

यथार्थ ने जकड़े पैर जमीनपर
स्वप्न ने खींचे हाथ आसमा तक
मनुष्य बन इतना सजग
ना कभी पैर उड़े स्वप्न के भाती
ना कभी स्वप्न को मान यथार्थ
तेरा रास्ता जमीन और आसमा के बिच का
तेरा रास्ता जीवन और मृत्यु के बिच का
तेरा रास्ता मानने और समझने के बिच का
तेरा रास्ता दार्शनिक और दृष्टा के बिच का
विचारो की मालाओ में दृष्टिकोण निर्मित है
दृष्टिकोण की मुक्ति से सत्यता पनपती है
सुंदरता सजग सरलता का रूप है
कठिन जटिल है अहंकार का स्वामी
मनुष्य जीवन दीपक ज्योति है
तेल बाती दिया तीनो का संगम है
यथार्थ स्वप्न कर्म का संयोग बनाकर
तू बने एक मिल का पत्थर
अमूर्त रूप सन्मानित होकर
तू नवनिर्मित का हो आविष्कार

- रानमोती / Ranmoti

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